शनिवार, 4 अप्रैल 2009

दो प्रेम कविताएँ





तुम्हारा चेहरा

शब्दों की नोंक पर खड़ा होकर
मैं लिखता हूँ कविताएँ

न जाने मुझे यह कौन कहता है
कि मेरे तलवे के ही खून से निकलकर कोई रास्ता
तुम्हारे घर तक जाता है

शायद इसीलिए
मेरी भाषा के जल में
लौ की तरह झिलमिलाता तुम्हारा चेहरा
बार-बार नज़र आता है

प्रेम में

प्रेम में आदमी बोलता है निःशब्द
तो धरती समझती है
उसका अर्थ

प्रेम में आदमी पलकें झपकाता है
तो मौसम बदलते हैं

प्रेम में कोई किसी को कह दे
पगली या कि मूर्ख
तो खिलखिला उठता है पूरा समुद्र


दोनों कविताएं ‘समय को चीरकर’(1998) संग्रह से
प्रकाशक:आधार प्रकाशन,पंचकूला, हरियाणा

8 टिप्‍पणियां:

  1. शायद इसीलिए
    मेरी भाषा के जल में
    लौ की तरह झिलमिलाता तुम्हारा चेहरा
    बार-बार नज़र आता है
    बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।

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  2. दोनों रचनाएं बहुत भावपूर्ण हैं\बधाई।

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  3. शानदार है आपकी कविताएं
    मोहक

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  4. KAVITAYE DIL KO CHUNE WALI HAI. LIKHATE RAHE.

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  5. भानु प्रताप सिंह।18 अगस्त 2012 को 11:16 am

    सुन्दर और भावपूर्ण कविताओं के लिये बधाई।

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