
अगर शहर में होता
तो शायद उधर ध्यान ही नहीं जाता
मगर यह
शहर के कहर से दूर विश्वविद्यालय का परिसर था
जहाँ चाय-बागान से छलकती आती हुई अबाध हरियाली
समूचे परिदृश्य को
स्निग्ध स्पर्श में बदल रही थी
और वहीं पर यह अभूतपूर्व घटना
चुपके से
आकार ले रही थी…
दरअसल हुआ यह था
कि क्वार्टर की ओर जानेवाली खुली सड़क के किनारे
एक पेड़ था
जिसके नीचे एक आदमी खड़ा था
पहली नज़र में
विह्वल करने वाला ही दृश्य था यह
क्योंकि आदमी के हाथ में कुल्हाड़ी नहीं थी
और उसे देखने से लगता था
कि सुबह का भूला शाम को घर लौट आया है…
कि तभी
उसके पौरुष से
एक धार सहसा उछली
और उसके साथ रिंग-टोन बजने लगा
यह एक नए किस्म का यथार्थ था
जिसके सामने मैं खड़ा था
निहत्था
अलबत्ता घटना एक ही थी
पर सत्य थे कई
पहला सत्य कहता था
कि आदमी का उमड़कर बाहर आ रहा है कुछ
इसलिए बज रहा है
दूसरा सत्य कहता था कि वह बज रहा है
इसलिए उससे फूट रही है जलधारा
तीसरा सत्य कहता था
कि वह वृक्ष को सींच रहा है
और चौथे सत्य को कहना था
कि यहाँ कर्ता नहीं है कोई
बस कुछ हो रहा है…
और जो कुछ हो रहा था
यह मंत्र है उसीका समाहार-
सोने की छुच्छी,रूपा की धार।
धरती माता, नमस्कार॥
उम्दा रचना..क्या सत्य भी परिस्थितियों के सापेक्ष हो सकता है..या उनका विष्लेषण हम अपनी सुविधा से कर लेते हैं..वस्तुत: तथ्य तो वही रहते हैं..अपरिवर्तनीय और निरपेक्ष
जवाब देंहटाएं"पहला सत्य कहता था
जवाब देंहटाएंकि आदमी का उमड़कर बाहर आ रहा है कुछ
इसलिए बज रहा है
दूसरा सत्य कहता था कि वह बज रहा है
इसलिए उससे फूट रही है जलधारा
तीसरा सत्य कहता था
कि वह वृक्ष को सींच रहा है
और चौथे सत्य को कहना था
कि यहाँ कर्ता नहीं है कोई
बस कुछ हो रहा है…"
मैं तो मुग्ध हुआ श्रीमन । रचना का प्रवाह अद्भुत है और बाँधने की क्षमता भी । मुझे आश्चर्य है, इस दृष्टि से मेरा परिचय इतने बाद क्यों हुआ ?
हिमांशु जी शुक्रिया।देर से ही सही,मुझे आप जैसा सह्र्दय तो मिला।
जवाब देंहटाएंDear Dr. K.M. Jha
जवाब देंहटाएंI have visited your blog and find it very interesting. I am really impressed with your creations . I admire your poems which is based on the real life situations and the surroundings. Your poems are supported by beautiful paintings which gives a new direction to the Hindi Poetry.
I wish you a successful career and hope in near future , your new creations will appear.
With kind regards
Dr. Manoj Kumar Sinha
Asst Librarian
Assam University
Silchar-788 011
mksinha1965@gmail.com, mksinha_2007@rediffmail.com
Sir
जवाब देंहटाएंBlog-jagat me badhai!
-kumar kaustubh
JNU-Jhelum-1992-2000
yatharth ke saamane nihatha khada hona--- aaj ke manushya ki sabse trasad sthiti hai jise aapne badi khubi ke sath ukera hai. charon satyon mein se badi chiz hai mantra mein samahar ho jana.
जवाब देंहटाएंsundar ati sundar kavita hai.
arun hota