बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

अकेले ही नहीं



मैं उन कहावतों और दंतकथाओं को नहीं मानता
कि अपनी अंतिम यात्रा में आदमी
कुछ भी नहीं ले जाता अपने साथ

बड़े जतन से जो पृथ्वी
उसे गढकर बनाती है आदमी
जो नदियाँ उसे सजल करती है
जो समय
उसकी देह पर नक्काशी करता है दिन-रात
वह कैसे जाने दे सकता है उसे
एकदम अकेला?

जब पूरी दुनिया
नींद के मेले में रहती है व्यस्त
पृथ्वी का एक कण
चुपके से हो लेता है आदमी के साथ
जब सारी नदियाँ
असीम से मिलने को आतुर रहती हैं
एक अक्षत बूँद
धारा से चुपचाप अलग हो जाती है
जब लोग समझते हैं
कि समय
कहीं और गया होगा किसी को रेतने
अदृश्य रूप से एक मूर्तिकार खड़ा रहता है
आदमी की प्रतीक्षा में।

हरेक आदमी ले जाता है अपने साथ
साँस भर ताप और जीभ भर स्वाद
ओस के गिरने की आहट जितना स्वर
दूब की एक पत्ती की हरियाली जितनी गंध
बिटिया की तुतलाहट सुनने का सुख
जीवन की कुछ खरोंचें,थोड़े दुःख
आदमी ज़रुर ले जाता है अपने साथ-साथ।

मैं भी ले जाउँगा अपने साथ
कलम की निब भर धूप
आँख भर जल
नाखून भर मिट्टी और हथेली भर आकाश
अन्यथा मेरे पास वह कौन सी चीज़ बची रहेगी
कि दूसरी दूनिया मुझे पृथ्वी की संतति कहेगी!


आधार प्रकाशन, पंचकूला द्वारा प्रकाशित
समय को चीरकर(1998)कविता संग्रह से

4 टिप्‍पणियां:

  1. "मैं भी ले जाउँगा अपने साथ
    कलम की निब भर धूप
    आँख भर जल
    नाखून भर मिट्टी और हथेली भर आकाश
    अन्यथा मेरे पास वह कौन सी चीज़ बची रहेगी
    कि दूसरी दूनिया मुझे पृथ्वी की संतति कहेगी!"

    मैं निःशब्द अविरत देख रहा हूँ इस रचनाधर्मिता को ।
    आभार ।

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  2. क्‍या बात है कविता के बहाने इस नये विचार पर बधाई.
    - प्रदीप जिलवाने, खरगोन म.प्र.

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  3. माधव, 'अकेले ही नहीं' मेरी प्रिय कविताओं में से एक है। मैंने इसे कई बार पढा है। यह बहुत उम्मीद जगाती है। समझो, हम जैसे लोग जिनके जीवन मे निरर्थकताऐं भरी पडी है, यह बहुत से अर्थ ढूंढ लाती है।

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  4. मैं भी ले जाउँगा अपने साथ
    कलम की निब भर धूप
    आँख भर जल
    नाखून भर मिट्टी और हथेली भर आकाश
    अन्यथा मेरे पास वह कौन सी चीज़ बची रहेगी
    कि दूसरी दूनिया मुझे पृथ्वी की संतति कहेगी!

    वाह..... बहुत ही सशक्त लेखन है आपका ....!!

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